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Updated: 15 जून, 2015 07:43 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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नहीं, ऐसा नहीं है. मनोहर पर्रिकर युद्ध नहीं चाहते. मगर मनोहर पर्रिकर की चिंता जायज है. बाकियों के मुकाबले उन्हें जवानों की ज्यादा फिक्र है, आखिर वो रक्षा मंत्री जो हैं.

पर्रिकर का बयान

जयपुर में एक सेमिनार में पर्रिकर कहते हैं, ''शांति के वक्त में लोगों में आर्मी के प्रति सम्मान कम हो जाता है, इसके कारण सैनिकों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है." पर्रिकर इस बारे में अपने प्रयासों का भी जिक्र करते हैं, "मैंने रक्षा मुद्दों को लेकर कई चीफ मिनिस्टरों को पत्र लिखा. कुछ ने इसका संज्ञान लिया और कई ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी."

"इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि पिछले 40-50 साल में कोई युद्ध नहीं हुआ," खुद ही वो इसकी वजह भी बताते हैं.

अपने बयान के साथ उन्होंने ये डिस्क्लेमर भी नत्थी कर रखा है, "लेकिन मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि हमें युद्ध करना चाहिए," ताकि बाद में सफाई न देनी पड़े. और तोड़ मरोड़ कर पेश करने की गुंजाइश भी न रहे.

वो अपनी बात दोबारा साफ करते हैं, "मैं यही बस कहना चाहता हूं कि युद्ध नहीं होने के कारण सेना का महत्व गिर जाता है."

सही बात है. अभ्यास से ही सब कुछ संभव है. बगैर अभ्यास के सब कुछ असंभव है.

अभ्यास ही जीवन है

अभ्यास सम्मान दिलाता है. अभ्यास छूट जाने पर सम्मान पर भी खतरा मंडराने लगता है.

अभ्यास से कुछ भी सीखा जा सकता है. अभ्यास छोड़ देने पर सब कुछ भूल जाता है.

एक दौर था जब न जाने कितने टेलीफोन नंबर याद रहते थे, सिर्फ डायल करने के अभ्यास के चलते. मोबाइल के फोनबुक ने अभ्यास खत्म कर दिया और अब तो खुद का नंबर भी याद नहीं रहता.

इसीलिए कहा गया है - अनाभ्यासे विषम् शास्त्रम् - यानी अभ्यास के बिना शास्त्र भी विष तुल्य होता है.

अभ्यास का असर इतना कारगर होता है कि 'करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान' जैसी बातें भी होती रहती हैं.

जब तोप मुनासिब न हो

अब अगर युद्ध नहीं होगा तो तोप कहां चलेगी. फिर तो बातों से ही काम चलाना पड़ेगा.

वैसे बातें कई बार ज्यादा असरदार साबित होती हैं. सियासत में तो बातें खास हुनर होती हैं. अनेक नाम हैं. बरसों से उन्होंने सिर्फ बातें ही की हैं - लेकिन दुकान धड़ल्ले से चल रही है. बस आइडिया होना चाहिए. जैसे प्रवीण तोगड़िया ने खोज लिया कि जब शिव का नाम ही नहीं लिया जाएगा फिर योग कैसा? अब बढ़ाते रहिए स्वीकार्यता. अपना काम तो हो गया.

दमदार बातें चौतरफा असर दिखाती हैं.

पहला, ऐसी बातें चर्चा में बनाए रखती हैं. दूसरा, ऐसी बातें मुद्दे का रूप ले लेती हैं और विरोधी उसमें उलझे रहते हैं. ऐसी बातें, दुश्मन को कन्फ्यूज करती हैं. और ये बातें जिनके लिए कही जाती हैं उन पर खास असर डालती हैं.

गौर फरमाइए - पर्रिकर अपनी बातों से सुर्खियों में बने हुए हैं. पर्रिकर बोल देते हैं और विरोधी उस पर प्रतिक्रिया देते रहते हैं. पर्रिकर की बातों पर पाकिस्तान भी हर बार रिएक्ट करता ही है. और पर्रिकर की बातें जवानों में जोश भर देती हैं.

पर्रिकर के ताजा बयान में एक बात खासतौर पर गौर करने वाली है. उनका कहना है कि भारत ने पिछले 40-50 साल में कोई युद्ध नहीं लड़ा है इसलिए भारतीय सेना का महत्व कम हुआ है. फिर कारगिल में जो हुआ उसे क्या वो युद्ध नहीं मानते?

लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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