इस मुस्कुराती बच्ची के गाल पर क्रूरता का निशान देखा आपने ?
एक बच्चे के जीवन का फैसले लेने का आधिकार तो उसके माता-पिता का होता है, लेकिन उनके शरीर के साथ खिलवाड़ करने का अधिकार तो जायज नहीं.
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पहले इस बच्ची की तस्वीर देख लीजिए. हंसती खिलखिलाती इस छोटी सी बच्ची को ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि इसके गाल पर कुछ चमक रहा है. असल में इसके गाल को छिदवाकर उसमें ये चमकता नग लगवा दिया गया है.
बच्ची के गाल को छिदवाया गया !
बच्ची की मां ने ये तस्वीर फेसबुक पर पोस्ट करते हुए लिखा है कि-
'मैंने अपनी बेटी के गाल छिदवाए हैं, ये कितनी प्यारी लग रही है न ! मुझे पता है उसे भी ये अच्छा लगेगा. बड़ी होने के बाद ये मुझे इसके लिए थैंक्यू कहेगी, और अगर बाद में इसे पसंद नहीं आए तो इसे निकाल कर फेंक भी सकती है.
मैं इसकी पेरेंट हूं और ये मेरी बच्ची है. मेरा जो मन कहेगा मैं करुंगी. जब तक कि ये 18 साल की नहीं हो जाती, मैं इसके लिए सारे निर्णय लूंगी. मैंने इसे पैदा किया है, इसपर मेरा पूरा अधिकार है. इसके लिए मुझे किसी की इजाजत की जरूरत नहीं, मुझे लगता है कि ये ऐसे ज्यादा अच्छी और प्यारी लग रही है, इसलिए मैंने इसके गाल छिदवाए.
ये गलत नहीं है, अगर गलत होता तो ये गैरकानूनी होता, लेकिन ऐसा नहीं है. लोग रोज अपने बच्चों के शरीर को छिदवाते हैं, मैंने क्या अलग किया है. मेरी बेटी, मेरी मर्जी, माता-पिता की मर्जी, माता-पिता का अधिकार ! मेरी परवरिश पर उंगली मत उठाइए, हम सब अपने बच्चों को अपने अपने तरीके से बड़ा करते हैं, इसमें आप अपना दिमाग मत लगाइए !!''
एक मां की बात तो आपने सुन ली, लेकिन अब जरा अंदाजा लगाइए कि जब इस मासूम के गाल छेदे जा रहे होंगे तो इसे कितना दर्द हुआ होगा. जब आप दर्द का अंदाजा लगाएंगे तो आपको इस महिला पर बहुत गुस्सा भी आएगा कि एक मां होते हुए भी इसने अपनी बच्ची को इतना दर्द कैसे सहने दिया. ऐसा गुस्सा कई लोगों को आया और उन्होंने इस मां को जान से मारने की धमकी तक दे डाली.
लेकिन, इस कहानी में एक ट्विस्ट बाकी था...
असल में जो दिखाया गया, सच वो नहीं था. मां ने बच्ची की तस्वीर को फोटोशॉप करके एक मकसद के तहत फेसबुक पर पोस्ट किया था. जो काफी हद तक सफल भी रहा. असल में ऐनेडिना वेन्स इस तस्वीर के माध्यम से बच्चों में खतना जैसी कुप्रथा और शरीर को छिदवाने की परंपरा की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित कराना चाहती थीं, और वो समाज में कही जाने वाली इस बात के बिलकुल खिलाफ हैं कि 'एक बच्चे के लिए माता-पिता ही सबसे बेहतर सोचते हैं'.
ये बात और है कि लोग इस पोस्ट में दिए गए संदेश को समझ नहीं सके, और ऐनेडिना को अपनी सफाई में दो पोस्ट और लिखने पड़े कि आखिर इस फोटोशॉप की हुई तस्वीर को लगाने का मकसद क्या था. पर ऐसा लगता है कि ऐनेडिना की ये पोस्ट खासतौर पर भारत जैसे देश में रहने वालों को समझाने के लिए ही लिखी गई है, क्योंकि खतना और शरीर को छिदवाने की परंपरा भारत में काफी देखने को मिलती है.
कितना सही है हमारा समाज ?
हमारे समाज में भी परंपरा के नाम पर बच्चियों के नाक-कान बचपन में ही छिदवा दिए जाते हैं, और तो और लड़के भी अछूते नहीं, कई जगह तो लड़कों के कान भी छिदवाए जाते हैं.
परंपरा के तहत लड़कों के कान भी बचपन में ही छिदवा दिए जाते हैं
ऐसा करने के पीछे लोग कई वजह बताते हैं और कई तर्क भी देते हैं, जैसे-
- ये परंपरा का हिस्सा है.
- लड़कियों के नाक कान न छिदवाए तो वो गहने कैसे पहनेंगी.
- कई लोग मन्नत के चलते लड़कों के कान छिदवाते हैं.
- कई लोगों का मानना है कि जिन लोगों के बच्चे जी नहीं पाते वो होने वाले बच्चे के कान छिदवा देते हैं तो वंश बढ़ जाता है.
- मान्यता ये भी है कि पहले देवी-देवताओं को बलि देने की प्रथा थी, और ये कान छिदवाना उसका ही आधुनिक रूप है. यानी बलि देने की प्रथा को लोगों ने अपनी सहूलियत के हिसाब से बदल लिया.
जिनेटियल म्यूटिलेशन (खतना), परंपरा के नाम पर क्रूरता
अब बात जिनेटियल म्यूटिलेशन की, यानी मुस्लिम समाज में लड़कों और लड़कियों में खतना कराए जाने की कुप्रथा. लड़कियों में खतना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें 6-12 साल की बच्चियों के जननांगों के एक हिस्से की त्वचा को ब्लेड से काटकर निकाल दिया जाता है. ठीक इसी तरह लड़कों के लिंग के ऊपर की चमड़ी काटकर अलग कर दी जाती है. WHO के अनुसार, इस परंपरा को लोग सेहत के लिए फायदेमंद मानते हैं लेकिन इसका परिणाम उलटा होता है. कई बार तो इससे बच्चियां गंभीर बीमारी का भी शिकार हो जाती हैं. दुनिया में हर साल करीब 20 करोड़ बच्चियों का खतना होता है.
इसके पीछे भी लोगों के पास बहुत सारे तर्क हैं, जिसकी वजह से आज भी ये प्रथा जारी है, जैसे-
- यह धार्मिक महत्व के कारण किया जाता है.
- यह अंग को छोटा करने के लिए किया है.
- यह एक सामाजिक परंपरा के रूप में निभाया जाता है.
- यह प्रथा स्वच्छता और सेहत के लिए की जाती है.
- कुछ लोग का कहना यह भी है कि युवा होने पर लड़कियों की सेक्स की इच्छा कम करने के मकसद से भी ऐसा किया जाता है.
इस कुप्रथा के खिलाफ काम करने वाली कार्यकर्ता मानती हैं कि महिलाओं का खतना एक तरह की यौन हिंसा है जिसमें पीड़ित को मानसिक और शारीरिक दोनों तरह के तनाव से गुजरना पड़ता है. कई संस्थाएं तो इसे महिलाओं के खिलाफ हिंसा में जोड़ चुकी हैं.
बच्चों पर ही ये जुल्म क्यों-
इन सभी कुप्रथाओं के पीछे समाज तर्क ये भी देता है कि बचपन में ही बच्चों के कान-नाक छिदवाना और खतना कराना सबसे उचित समय है, क्योंकि तब त्वचा नर्म होती है और काम आसानी से हो जाता है. और दूसरी बात कि बच्चों को दर्द कम महसूस होता है, जो बेहद बचकाना सा तर्क है. जबकि वैज्ञानिक मानते हैं कि बच्चे भी वयस्कों के जितना ही दर्द महसूस करते हैं.
तो अगर आपको बच्ची की ये तस्वीर देखकर गुस्सा आया तो ये गुस्सा इन कुप्रथाओं को देखकर क्यों नहीं आता जो हमारे समाज में पसरी पड़ी हैं. जिनके पीछे का उद्देश्य भी साफ नहीं है, जो सिर्फ और सिर्फ दर्द देती हैं. क्यों सिर्फ समाजिक दबाव में आकर हम अपने ही बच्चों को इस दर्द में धकेलते हैं.
ये बात सच है कि अपने बच्चों की जिम्मेदारी माता-पिता के पास ही होती है, लेकिन वो हर जगह सही हों, ये जरूरी तो नहीं. बच्चों के शरीर को छिदवाना है या फिर कुछ कटवाना है, तो उसका अधिकार आपका नहीं, सिर्फ उस बच्चे का है. बड़ा होकर वह भले खुद को इलायन डेविडसन जैसा बना ले...
इलायन डेविडसन का नाम वर्ल्ड रिकॉड्स में शामिल है.
ब्राजील की इलायन डेविडसन वो महिला हैं जिन्होंने अपने शरीर को 9000 से ज्यादा बार छिदवाया है. इस अनूठे शौक ने उनको सन् 2000 में गिनीज बुक ऑफ रिकॉड्स में जगह दिला दी. वे अभी स्कॉटलैंड में रहती हैं. बॉडी पियर्सिंग और टेटू कराने का बिजनेस है उनका. बेशक इस पेशे में इलायन अपने अनूठे शौक की वजह से ही आई हैं. अपने शरीर को ऐसा बनाने के लिए पूरी तरह वे ही जिम्मेदार हैं. किसी ने कोई जबर्दस्ती नहीं की. बचपन में कोई लालच देकर उन्हें किसी ने दर्द नहीं पहुंचाया.
तो समय आ गया है कि इस दिशा में भी सोचा जाए और बच्चों पर रहम खाया जाए.
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