ध्यान रहे! असंसदीय शब्द पर बैन लगा है, व्यवहार पर नहीं!
भाषा को लेकर संसद के फैसले के बाद, नेता बिरादरी भी भयंकर तनावग्रस्त है कि 'ब्रो अगर हमने भद्र भाषा अपना ली, तो हमारा तो टोटल अस्तित्व ही खतरे में आ जायेगा. पब्लिक का राजनीति पर से विश्वास उठ जायेगा. रोज़गार और शिक्षा से विमुख जनता के नीरस जीवन में रंग भरने कौन आएगा?
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खेत से तोड़ी गई सब्जी से भी ज्यादा ताजा घटना है. अब जब घटित हो ही चुकी है तो हमारा भी दायित्व बनता है कि निर्मल भाव से इस घटना प्रधान युग के हवन कुंड में अपनी आहुति डालकर मुक्त हो लें. तो हुआ यूं कि मां ने अपने समाजसेवी लाल से कहा, 'पुत्र, नया संकलन आ गया है पुस्तक मेले में. फटाफट याद करके राजा बेटा बनकर ही विद्यालय में क़दम रखना। नहीं तो मास्साब ऐसी ठुकाई करेंगे कि जाना भूल जाओगे!'
'अरे, ऐसे-कैसे गुस्सा करेंगे! तानाशाही है क्या?' बेटा तुनककर बोला.
'चुप, एकदम चुप, मुंह बंद! किसी ने सुन लिया तो एडमिशन कैंसिल ही समझो!' मां ने घबराते हुए दोनों पंजे फैलाकर अपने बालक का मुंह ही भींच डाला.
'अरे! आज आप इतना drama क्यों कर रही हो? मैं कोई बालबुद्धि थोड़े ही हूं!'
'हे ईश्वर! बस, यही दिन देखने को जीवित रखा था! ये इस घर में किस पापी, अधर्मी ने जन्म ले लिया!' कहकरमां मूर्छित हो गई. पुत्र भीषण दुख में डॉक्टर की देहरी पर विलाप कर रहा पर मारे भय के न तो वह ashamed फ़ील कर पा रहा और न ही मां betrayed.
मॉनसून सत्र से पहले आयी शब्दों की नयी सूची लोक सभा- राज्य सभा दोनों सदनों की कार्यवाही के दौरान लागू होगी.
तो साब! जब से शब्दकोश का नया संस्करण बाज़ार में आया है. 'देशभक्त' प्रसन्न हैं एवं सभी 'राष्ट्रद्रोहियों' का हृदय ज़ार-ज़ार रो उठा है. बेचैनी अपने चरम पर है और भाव नए शब्द खोजने में व्यस्त हो चुके हैं. अब पर्यायवाची शब्दों की ऐसी महामारी आएगी कि मियां कोरोना भी शर्मा के बिल में छुप जाएं.
अच्छा! आपको बचपन का वो किस्सा तो स्मरण होगा ही जिसमें एक बच्चे को मोहल्ले के तमाम बच्चे नए-नए विशेषणों से अलंकृत करते हैं. वह भोला बालक सब दिल पर ले लेता है. शुरू में तो वह बाकियों से लड़ता-भिड़ता है पर कुछ समय बाद मुंह बिचकाकर कहने लगता है, 'जो बोलता है, वोई होता है'. लेकिन मन-ही-मन उसे उन सारे शब्दों से घृणा हो जाती है और वह जीवन भर उनसे बचने का उपाय खोजता रहता है.
बस! नया शब्दकोश यही 'यूरेका मोमेंट' है. अब जिसे नहीं जमा, उसका मन करे तो वो भी कह दे, 'जाओ हम नहीं खेल रहे! ये तो खुलेआम बेईमन्टी है'. अरे भई! सूची पसंद नहीं आई, तब भी नथुने फुलाने और माथे पर बल डालने की कोई आवश्यकता नहीं! क्योंकि 'ध्यान रहे! असंसदीय शब्द पर बैन लगा है, व्यवहार पर नहीं!' और हम तो बड़े क्रिएटिव वाले प्राणी हैं न! हीहीही! मतलब गाली खाने और कुटने के सारे काम भले ही कर लो, बस मुंह मत खोलना!
एक समस्या और आन पड़ी है कि प्रतिबंधित शब्दों में कुछ तो ऐसे हैं जिनके नाम के व्यक्ति राजनीति के महकते आंगन में चहकते पाए गए हैं. भिया, इसका देसी उपाय तो यह है कि दुल्हन की तरह घूंघट की ओट से कहा जाए कि 'जरा हमाए बिनको बुलाय द्यो. बो का है न कि हम लाज के मारे नाम नहीं ले सकत हैं”. हां, उनका नया आधार कार्ड बनवाने का खर्चा जरूर लग जाएगा. अब राष्ट्रहित में इतना तो किया ही जा सकता है न!
दूसरा एकदम सिम्पल उपाय है कि सबको रोल नंबर से बुलाओ. हां यह एकदम सच है कि अचानक इस खबर के आने से देश भर में चिंता की लहर तो दौड़ गई है. झुमरीतलैया के बबलू, गुड्डी, पिंकी और उनके मम्मी-पापा यह सोच हलकान हुए जा रहे कि अब जीवन में एडवेंचर कहां से आएगा! आपस मे लड़ने भिड़ने को ज़िंदगी मे बचेगा ही क्या! दोस्त-परिजनों से रिश्ते खराब करके बचत कैसे कर सकेंगे!
नेता बिरादरी भी भयंकर तनावग्रस्त है कि 'ब्रो अगर हमने भद्र भाषा अपना ली, तो हमारा तो टोटल अस्तित्व ही खतरे में आ जायेगा. पब्लिक का राजनीति पर से विश्वास उठ जायेगा! रोज़गार और शिक्षा से विमुख जनता के नीरस जीवन में रंग भरने कौन आएगा? अब हम कहां जाकर आपस मे लड़ेंगे जी? और उन चैनलों का क्या जिनकी TRP की नींव हमारी भद्रता के सदके धसक जाएगी! व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के सिलेबस का upgraded version अब कैसे आएगा?'
हमारे भावुक मन से इतना दुख तो कतई नहीं देखा जा रहा! बस यह सोचकर मन को तसल्ली दे रखी है कि उम्मीद पर दुनिया कायम है. और जो दृश्य भवन के भीतर हुआ करते थे, वे अब बाहर अवश्य ही होंगे. यक़ीन कीजिए, बाहर का कार्यक्रम और अधिक दर्शनीय होगा क्योंकि माननीय न्यूटन जी के अनुसार 'जो शब्द बंदों के हलक में अंदर फंसे रह गए थे, वे दुगुनी शक्ति से टनटनाटन बाहर आएंगे और उसके बाद जो समां बंधेगा न कि उफ्फ़! आंखें ही न छलक उठें! हम तो ये सोचकर भी प्रसन्न हो पा रहे हैं कि नए पर्यायवाचियों के निर्माण के चलते, कम से कम हिन्दी के अच्छे दिन तो आ ही जाएंगे! और बलिस्वरूप प्रदत्त सारे तिरस्कृत असंसदीय शब्द, अपने मोक्ष का अमृत महोत्सव मनाएंगे. जै राम जी की!
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