निर्भया की निर्दोष मां को सात साल की 'सजा' मिली, इसका न्याय कौन करेगा?
निर्भया मामले में इंसाफ (Nirbhaya Case Justice) हो गया है. चारों दोषियों को फांसी (Nirbhaya Convicts Hanged) हो चुकी है. लेकिन सात वर्ष चली इस लड़ाई से सबसे बड़ा सवाल हमारी न्यायपालिका पर खड़ा हुआ है.
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न्याय ऐसा होना चाहिए कि देश में न्यायपालिका के प्रति लोगों का विश्वास जीत ले और समाज के गैर जिम्मेदार नागरिकों को सचेत कर दे कि हर गलती का हर्जाना देना पड़ता है. सात वर्ष से निर्भया (Nirbhaya Case) के परिवार के साथ- साथ इस देश की जनता ने भी न्यायपालिका पर अपना विश्वास खोया है. ऐसे में जब सरकार "पीड़िता फंड" (Nirbhaya Fund) के नाम पर जो आश्वासन जनता को पहुंचाना चाहती है वो भी कोरी जुमलेबाजी के सिवाय कुछ नहीं कहलाता. होना तो ये चाहिए कि दोषियों को फास्ट ट्रैक कोर्ट (Fasttrack Court) के अन्तर्गत ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ते में फैसला सुना देना चाहिए. दर-दर भटकती निर्भया की मां को चैन की सांस आई होगी किन्तु न्याय के लिए लड़ते लड़ते इन सात बरसों में को खून के आंसू उन्होंने पिए हैं उनका हिसाब कौन देगा? देर आए दुरुस्त आए ये सोचकर अगर ये मान भी लें कि निर्भया को इंसाफ मिल गया फिर भी सरकारी व्यवस्थाओं पर विश्वास बनाए रखना मुश्किल लगता है. बलात्कार पीड़ित लड़की के साथ साथ एक पूरा परिवार इस लचर कानून व्यवस्था (Law And Order) से जूझता है.
निर्भया के दोषियों को फांसी तो हुई मगर उसके लिए देश की जनता ने लंबा इंतजार किया
अब समय आ गया है कि सरकार को अपनी कानूनी कार्रवाई में बदलाव करना चाहिए, बलात्कार आरोपियों को सरकारी वकील मुहैया करवाना अगर एक प्रक्रिया है तो ऐसे वकीलों पर भी समय की पाबंदी लगाई जानी चाहिए, वे अपने मुवक्किल के लिए बेशक केस लड़ें किन्तु एक निश्चित समय सीमा के भीतर उन्हें इस पूरे कार्यवाही को निबटाने का दबाव होना चाहिए. एक स्त्री यदि बलात्कार झेलती है तो उस जघन्य अपराध के साथ - साथ वह अपनी पहचान भी खो देती है, अपना नाम, परिचय, रोजगार और सामाजिक जीवन सब उससे छीन लिया जाता है. एक स्त्री होने के नाते मुझे ऐतराज़ है कि बलात्कार के बाद स्त्री का नाम छुपाने और उसे पीड़िता, निर्भया, गुड़िया आदि नए नाम देने के बजाय उसे उसके वास्तविक नाम से पुकारा जाता चाहिए.
ऐसा करके तो समाज उससे उसकी बाक़ी की जिन्दगी भी छीन लेता है, वह दोषी न होते हुए भी दोषी मान की तरह जीवन जीने को मजबूर की जाती है, क्यों आवश्यकता है कि बलात्कार के बाद स्त्री अपना मुंह दुपट्टे में लपेटकर रहे, क्यों नहीं वह इस सबका मुकाबला सिर उठाकर करे? और अगर मुंह छिपाना ही है तो आरोपी को अपना मुंह छिपाना चाहिए जिसने उस घृणित कार्य किया है. आज निर्भया के परिवार के साथ पूरे देश ने राहत की सांस ली होगी, साथ ही पूरे देश में.
अपराधी प्रवृत्ति रखने वाले बीमार मानसिकता वाले लोगों को एक कड़ा संदेश गया है कि आरोपी चाहे कुछ भूनकर के वह सजा से बच नहीं सकता. लेकिन क्या अच्छा होता कि यही सजा जल्दी सुनाई गई होती तो बीते सात वर्षों में हुए अपराधिक मामलों में कुछ कमी आई होती. इस पूरे मसलें में आरोपियों के परिवार के साथ सहानुभूति रखी जा सकती है. किन्तु यही भावना एक निर्दोष स्त्री के जीवन के प्रति भी रखी जाना ज़रूरी है इसलिए कहा जाता है कि परिवार से पहले समाज की सोचो और समाज के साथ मिलकर देश के बारे में, इस कड़ी में परिवार बाद में और देश सर्वोपरि आता है.
वैसे भी दोषी के साथ साथ उसके परिवार को भी ये समझना चाहिए कि कहीं न कहीं आरोपी में सु-संस्कार रोपे जाने में कमी परिवार से ही हुई है. सदियों से हर परिवार में लड़कियों को ही संस्कारित किया जाता रहा है किन्तु अब समय है कि पुरुषों को भी संस्कार दिए जाने चाहिए, उन्हें स्त्रियों की इज्जत व सम्मान करना सिखाना चाहिए. निर्भया को न्याय मिला जो कि मिलना ही था किन्तु यदि यही फैसला समय पर हो गया होता तो न्याय पालिका पर लोगों का विश्वास सुदृढ़ रहता.
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